JYOTSANA VARDHAN (ज्योत्सना वर्द्धन )
ID: df2c32f3bb9aमेरे गाँव की आजादी की कहानी
- Gender: 👩 Female
- Class / Role: 🎓 Class 5
- School: 🏫 UMS PAHAD CHAK MOTIPUR, MUZAFFARPUR (उत्क्रमित मध्य विद्यालय पहाड़ चक, मोतीपुर )
- District & Block: 📍 MUZAFFARPUR, MOTIPUR
- Applied Category: 📝 Teacher
*संस्मरण : स्वतंत्रता सेनानी डाॅ राजेंन्द्र सिंह*
*संस्मरण : स्वतंत्रता सेनानी डाॅ राजेंन्द्र सिंह*
देशप्रेम एक जन्मजात गुण होता है या कह लें कि ईश्वर प्रदत्त उपहार। संसाधनों की कोई कमी नहीं। नाना, पिता और चाचा का इकलौता वारिश फिर भी देशभक्ति का जुनून ऐसा की किसी के रोकने से रुकी नहीं। ऐसा था स्वतंत्रता सेनानी राजेंन्द्र। शीत का महीना देश पर फिरंगियों का शासन।उसी परतंत्र भारतभूमि पर ना जाने कितने वीरों का जन्म हो रहा था। उस समय कोई नहीं जानता था कि कौन शिशु गुलाम भारत माता को आजाद कराने में कितना सहयोग देगा। 27वीं नवम्बर 1903 को जमींदार श्री रामध्यान सिंह गांव - भरत राउत ,पोस्ट - हाजीपुर, जिला - मुजफ्फरपुर, बिहार के यहां, उनकी एक मात्र जीवित संतान श्रीमती मोती कुंअर के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ। नाना-नानी की तो खुशी का ठिकाना नहीं था। घर में प्रसन्नता छाया था। कोने- कोने में खुशियां व्याप्त थीं।
नवजात शिशु के जन्म के समय जमींदार पिता श्री जनक सिंह अपने पैतृक गांव- अम्बेशालेपुर , पोस्ट- भागलपुर, जिला- भागलपुर, बिहार में थे। वहां भी परिवार को जन्मोत्सव की खुशियां दी गयी। सभी स्थानों पर खुशियां ही खुशियां थीं। अपने पिता तथा चाचा पुलिस इंस्पेक्टर श्री बेनी माधव सिंह के लिए भी पुत्र इकलौता था। क्योंकि चाचा भी नि:संतान थे।
एक शिशु का जन्म तीन परिवारों की खुशियां। सभी स्थानों पर प्रसन्नता ही प्रसन्नता।
बच्चा धीरे-धीरे लाड प्यार के साथ बचपन से जवानी की ओर कदम दर कदम बढ़ने लगा। राजेन्द्र का पाणी ग्रहण संस्कार आरा निवासी श्रीमती भागवती देवी से हुआ। राजेन्द्र सिंह जी और श्रीमती भागवती देवी जी को दो पुत्र और तीन पुत्रियां हुई। देश आजादी के लिए बेचैन था। राजेन्द्र सिंह भी देश के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए तथा आजादी के लिए अपना घर परिवार को छोड़कर भारतमाता की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए सक्रिय हो गए। फिरंगी शासन इन्हें खोजने लगी। कालांतर में गरमदल (क्रांतिकारी) छोड़कर नरमदल (गांधी जी) से प्रभावित होकर नरमदल में आ गए। दोनों दल का मकसद एक ही था देश को फिरंगियों से आजाद कराना। कुछ समय बाद इन्हें गिरफ्तार कर 28 माह के लिए पटना के सेन्ट्रल जेल नजरबंद कारावास के लिए भेजा गया। जेल जीवन के मुख्य साथी श्री दीप नारायण सिंह मुख्य मंत्री बिहार भी थे। उस समय इनकी छोटी बेटी केवल छः माह की थी।
फिर भी उन्हें कोई अफसोस
नहीं था। देश सर्वोपरि था।
उस समय इनके नाना जी श्री रामध्यान सिंह जी की उम्र 80 वर्ष थी। जेल जीवन में कई क्रांतिकारी एवं गांधीवादी व्यक्तियों के सम्पर्क में रहे।
जेल जीवन के यात्रा में इनका
संपर्क उस काल के प्रसिद्ध चिकित्सक डाॅ लम्बोदर मुखर्जी से हुआ। डाॅ मुखर्जी पटना सेन्ट्रल जेल के चिकित्सा अधिकारी थे। उन्होंने
अपनी जिज्ञासा डाॅ मुखर्जी को बताई कि मुझे भी
डॉक्टर बनने का मन है परन्तु......। डॉ मुखर्जी
ने जेलर से बात की। जेलर
तैयार हुआ। फिर उन्हें
किताब कॉपी वगैरह उपलब्ध
कराया गया। डाॅ मुखर्जी उन्हें होमियोपैथी की शिक्षा देने लगे। 2 वर्ष 4 माह की जेल यात्रा में राजेन्द्र सिंह होमियोपैथ बन गए।
देश आजाद हुआ। डाॅ राजेन्द्र सिंह को जेल से रिहाई मिल गयी। रिहाई के समय डाॅ लम्बोदर मुखर्जी ने कहा था कि यहां से जाने के बाद एक वर्ष तक हाजीपुर में किसी अनुभवी होमियोपैथ के साथ उनका असिस्टेंट बनकर रहना। फिर अपना स्वतंत्र क्लिनिक खोलना। डाॅ राजेंन्द्र सिंह ने गुरु के आज्ञा का पालन किया। एक वर्ष बाद डाॅ सिंह ने एक चैरिटेबल क्लिनिक खोल दिया। भारतीय राष्ट्रय कांग्रेस द्वारा डाॅ सिंह को हाजीपुर सब डिविजन का नगर कांग्रेस कमिटी अध्यक्ष बना दिया गया। देश सेवा का प्रण लेने वाला डाॅ राजेंन्द्र अब साथ-साथ दलीतों, पीड़ितों, और शोषित रोगियों की सेवा भी शुरु कर दिया।हाजीपुर नगर के बहुत सारे शिक्षा संस्थान तथा अन्य संस्थानों में कही अध्यक्ष, कहीं सचिव तो कहीं मेंबर बनाए गए। जिनमें आर.एन. काॅलेज, जी.ए. हाई स्कूल, राज्य स्व-पोषित बालिका विद्यालय, नगरपालिका, खादी ग्रामोद्योग काॅपरेटिव सोसाइटी, नगर महादेव बाबा पतालेश्वर नाथ मंदिर धाम इत्यादि, इत्यादि। सन् 1972 में भारतवर्ष की प्रधान मंत्री श्री मति इंदिरा गांधी के कर कमलों द्वारा कचहरी मैदान प्रांगण के राजनीतिक सभा मंच से स्वतंत्रता संग्राम में उत्कृष्ट योगदान के लिए हाजीपुर का प्रथम ताम्रपत्र प्रदान किया गया। व्यस्त राजनीतिक जीवन के बावजूद भी इन्होंने अपनी चैरिटेबल औषधालय कभी बंद नहीं की। मरनासन्न अवस्था में भी इन्होंने पीड़ित मानवता की सेवा जारी रखी। इनका स्वर्गारोहन 01.06.1983 में अपने भरे पूरे परिवार के बीच में हुआ। इनकी संपूर्ण गाथा को कागज पर उकेरना संभव नही होगा। जितनी यादें जेहन में थी, उन्हें जीवंत करने का एक छोटा सा प्रयास है। साथ ही उनको आभार देने का माध्यम भी। बंदे मातरम्, जय हिंद, जय भारत।