Dr. Deepak Kumar Ojha (डॉक्टर दीपक कुमार ओझा )
ID: 4e0385d4f0f7

मेरे गाँव की आजादी की कहानी

  • Gender: 👨 Male
  • Class / Role: 👩‍🏫 Teacher
  • School: 🏫 U. M. S. Bhagrasna Dhamar, Ara, Bhojpur (उत्क्रमित मध्य विद्यालय भगरसना धमार )
  • District & Block: 📍 BHOJPUR, ARA
  • Applied Category: 📝 Teacher
Selected Under: Judge's Choice Marks: 9/10 Download Certificate
Competition Photos
लसाढी़ नरसंहार

                     लसाढी़ नरसंहार                                 सन् 1942 की अगस्त क्रांति व भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी भोजपुर जिले में आन्दोलन की ज्वाला खूब भड़की। 15 सितम्बर 1942 को अगियांव  प्रखण्ड के लसाढी सहित उसके आसपास के गांवों के लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया था।          सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन चरम पर था। उस समय भोजपुर जनपद में लसाढी़ गाँव भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान क ई नेताओं की शरणस्थली था। इस गाँव के किसान अंग्रजों से मुकाबला तो करते ही थें। साथ ही आस पास के गाँव ढकनी, चासी  आदि के किसानों को भी अंग्रजों से मुकाबला करने के लिए प्रेरित करते थे। एक बार जब इस गाँव में आंग्रेज कलक्टर आया तो यहाँ उसका जोरदार विरोध हुआ। ग्रामिणों ने लाठी और भाला लेकर उसे खदेड़ दिया। इस घटना से नाराज होकर सरकार ने रायबरेली से बलूच सिपाहियों को लसाढी़ गाँव को नेस्तनाबूत करने के लिए भेजा।                                   लसाढी़ गाँव के नौजवानों को जब इस बात की सूचना मिली तो वे रति भर नहीं डरें। उल्टे उन्होंने ब्रिटिश सरकार को और बढिया से सबक सिखाने की ठान ली। गाँव के नौजवानों ने योजना बनाई की जब बलूची सिपाही गाँव में आयेंगे तो लाल मिर्च के पाउडर उनकी आखों में झोक कर बंदूक छीन ली जायेगी। सिपाहियों का मुकाबला परम्परागत हथियारों से किया जायेगा। इसके लिए ग्रामिणों ने गाँव के पास पुल को तोड़ दिया एवं नहर को काट दिया।         अंग्रेज सैनिकों ने अपनी योजना के अनुसार 15 सितम्बर 1942 को 3 बजे भोर मे ही गाँव को चारों ओर से घेर लिया। गाँव के बाहरी हिस्से में मौजूद महादेव सिंह नामके  किसान के मकान को पहले निशाना बनाया गया। लेकिन महादेव सिंह के परिवार वालोँ ने अंग्रेज सैनिकों से डटकर मुकाबला किया। साथ ही तीन सैनिकों को मार गिराया। इसके बाद भड़के ब्रिटिश सैनिकों ने गृहस्वामी की हत्या कर दी। इसके बाद गाँव को निशाना बनाकर चारों ओर से स्टेन गन, एलएम जी जैसे अत्याधुनिक हथियारों से गोलियों की बौछार कर दी गयी‌। इस की बजह से 12  स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गयें और 8 लोग बुरी तरह जख्मी हुए। लगभग 50 लोगो को बंदूक के कूंदे से पीटा गया और सेनानियों को जेल भेज दिया गया।              ब्रिटिश हकुमत की बर्बरता के खिलाफ इस ऐतिहासिक जन प्रतिरोध में लसाढी़ एवं चासी गाँव के महादेव सिंह, वासुदेव सिंह, जगरनाथ सिंह, सभापति सिंह गिरिवर सिंह, रामानंद पाण्डेय, रामदेव साह, सीतल लोहार, केशव सिंह और 

एक वीरांगना अकली देवी शहीद हुई।          इन 12 अमर शहीदों की आदमकद प्रतिमा एक विशाल चबूतरे पर लसाढी़ गाँव मे स्थापित है। 


Remarks
Very Nice
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