Dr. Deepak Kumar Ojha (डॉक्टर दीपक कुमार ओझा )
ID: 15edb84ed6c4मेरे गाँव की आजादी की कहानी
- Gender: 👨 Male
- Class / Role: 👩🏫 Teacher
- School: 🏫 U. M. S. Bhagrasna Dhamar, Ara, Bhojpur (उत्क्रमित मध्य विद्यालय भगरसना धमार )
- District & Block: 📍 BHOJPUR, ARA
- Applied Category: 📝 Teacher
कवि कैलाश
कवि कैलाश भोजपुर जिले के स्वतंत्रता सेनानियों की एक लम्बी फेहरिस्त है, जिनका आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनमे से एक प्रमुख नाम है- अमर शहीद कैलाश पति सिंह उर्फ कवि कैलाश। राष्ट् भक्त पिता बाबू राम सिह एवं राष्ट्र भक्त माता - अनजानो देवी के लाल कवि कैलाश का जन्म 1889 ई० मे वर्तमान जिला भोजपुर के सदर प्रखण्ड अन्तर्गत खजुरिया पंचायत के घोडादेई ग्राम में हुआ था। आर्थिक संकट के कारण कवि कैलाश द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व सेना के 11 वे राजपूत रेजिमेंट में सिगनल मैन की नौकरी की। लगभग 8 साल तक फौज की नौकरी के दौरान क ई देशों में ब्रिटिश सरकार का सिपाही बनकर वीरतापूर्वक युद्ध मे लडाई लडी। इन्हें वीरता के लिए क ई पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। सेना में रहते हुए अंग्रजों के द्वारा भारतीय लोगो के साथ भेदभाव को देखकर उनहोंने भारत को स्वतंत्र कराने का संकल्प लिया। फौज से त्याग पत्र देकर घर आये। इसके बाद इनका बगीचा स्वतंत्रता सेनानियों का अड्डा बना। कवि कैलाश गाँव-गांव घुमकर गांधीजी के नितियों से लोगों को अवगत कराते और विदेशी वस्तुओं का वहिष्कार की प्रेरणा देते। कवि कैलाश के बगीचे मे जिले के प्रमुख क्रांतिकारियों की एक बैठक में दिनांक 28 सितम्बर 1942 को सुबह 6 बजे सदर प्रखण्ड के जोगवलिया गाँव के बगीचे मे एकत्रित होकर कल्कट्री के लिए प्रस्थान करने व समहरणालय पर तिरंगा फहरा कर मालगुजारी देने से मना करने का निर्णय लिया गया। 28 सितम्बर को कल्कट्री के पास अंग्रेजो ने सुरक्षा के पुरा प्रबंध करते हुए धारा 144 लगा दिया। कवि कैलाश अपने चंद साथियों के साथ कल्कट्री परिसर पहुंच कर झंडे को झोले से निकालकर एक छड़ी मे लगाया और झंडा को लहराते हुए भारत माता की जय, महात्मा गॉंधी की जय और अंग्रजों भारत छोडो का नारा लगाते हुए आगे बढे, तभी अंग्रेज सैनिकों एवं बलूच सिपाहियों ने कवि कैलाश को पकड़ कर निर्ममता पूर्वक मारा। सिपाहियों ने बंदुक के संगिन एवं बूट से मारा उन्हें उछाल-उछाल कर पटका। उनके शरीर पर गर्म पानी फेक कर , नमक डाल कर चुप कराने का प्रयास किया गया। इसके वावजूद भी कवि कैलाश अंतिम साँस तक नारा उदघोष करते हुए मातृभूमि के लिए शहादत देकर अमर हो गयें।