Shailja Akhauri (शैलजा अखौरी )
ID: 05429c870b08

मेरे गाँव की आजादी की कहानी

  • Gender: 👩 Female
  • Class / Role: 👩‍🏫 Teacher
  • School: 🏫 M S Adarsh Kalyani, Town area, Muzaffarpur (आदर्श मध्य विद्यालय कल्याणी , टाउन एरिया, मुजफ्फरपुर )
  • District & Block: 📍 MUZAFFARPUR, MUSHARI
  • Applied Category: 📝 Teacher
Selected Under: Judge's Choice Marks: 9/10 Download Certificate
Competition Photos
Graduate trained elementary teacher

भारत के सच्चे सपूत: श्री सूर्यानंद अखौरी

पलामू की लाल मिट्टी में जन्मे मेरे पिता श्री सूर्यानंद अखौरी का जन्म 10 सितंबर 1907 को डंडार कला गाँव, पांकी प्रखंड, तत्कालीन पलामू जिला, बिहार में हुआ था, जो आज झारखंड का हिस्सा है। उनके पिता ब्रिटिश प्रशासन में दारोगा थे, किंतु जब वे केवल ग्यारह वर्ष के थे, तभी पिता का निधन हो गया। उनकी माता ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया और उन्हें शिक्षा, संस्कार तथा जीवन में आगे बढ़ने का साहस दिया।

उन्होंने डाल्टनगंज, वर्तमान मेदिनीनगर, से दसवीं तक शिक्षा प्राप्त की और आगे काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में अध्ययन किया। काशी का राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक वातावरण उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव छोड़ गया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन तथा भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना के विचारों ने उनके भीतर देश के लिए कुछ करने की भावना को मजबूत किया। शिक्षा उनके लिए केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि देश, समाज और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने का साधन बन गई।

स्वतंत्रता आंदोलन से उनका जुड़ाव धीरे-धीरे सक्रिय नेतृत्व में बदल गया। वे सभाओं, जुलूसों और गुप्त बैठकों में भाग लेते थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 24 अगस्त 1942 को लेस्लीगंज, पलामू  में अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार सात कांग्रेस कार्यकर्ताओं को छुड़ाने की घटना में उनकी भूमिका के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके इस योगदान का उल्लेख प्रसिद्ध इतिहासकार के.के. दत्त की पुस्तक "बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास, खंड-III (१९४२-१९४७)"में भी मिलता है।

उन्होंने लगभग डेढ़ वर्ष पलामू और हजारीबाग की जेलों में बिताए। जेल की कठिन परिस्थितियों, खराब भोजन और परिवार से दूरी के बावजूद उनका मनोबल नहीं टूटा। जब कोई नया राजनीतिक बंदी जेल में प्रवेश करता, तो कुछ ही क्षणों में वातावरण बदल जाता। “भारत माता की जय” और “वंदे मातरम्” के नारों से जेल की दीवारें गूंज उठती थीं। जेल उनके लिए केवल कारावास नहीं, बल्कि अध्ययन और चिंतन का काल भी था। उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक क्रांतियों से संबंधित साहित्य के साथ वेद, उपनिषद, रामायण और भगवद्गीता का अध्ययन किया। इन अध्ययनों ने उनके भीतर स्वतंत्रता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, समाज और मानव जीवन को समझने की दृष्टि विकसित की।

15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता को संघर्ष का अंत नहीं माना। स्वतंत्र भारत में वे पलामू जिला बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे और लगभग दस वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र में नेतृत्व किया। सड़कों, प्राथमिक विद्यालयों और आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्रों के विकास में भी उन्होंने योगदान दिया।

स्वतंत्रता की 25वीं वर्षगांठ, 1972 में, उनके स्वतंत्रता संग्राम के योगदान के लिए उन्हें ताम्रपत्र से सम्मानित किया गया तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा उनका सम्मान किया गया। आज पांकी प्रखंड मुख्यालय में बना उनका स्मारक उनके संघर्ष, नेतृत्व और राष्ट्रसेवा की स्मृति को जीवित रखता है।

मेरे पिता की विरासत केवल स्वतंत्रता सेनानी की नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की विरासत है जिसने देश की आजादी के लिए जेल सही और आजादी के बाद शिक्षा, समाज और गाँवों के विकास को अपना कर्तव्य माना। उनकी जीवन-गाथा पर दिनकर की पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं- “कलम, आज उनकी जय बोल।”

Remarks
Very Nice
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