RANJEET KUMAR (रणजीत कुमार )
ID: 711cbcce2a61शिक्षा के गुमनाम नायक
- Gender: 👨 Male
- Class / Role: 🎓 Class 1
- School: 🏫 P S R B TOL DHARAMPUR RAHUA ROSERA (प्राथमिक विद्यालय राम विलास टोल धर्मपुर रहुआ रोसड़ा समस्तीपुर )
- District & Block: 📍 SAMASTIPUR, ROSERA
- Applied Category: 📝 प्रधानाध्यापक/प्रधान शिक्षक
प्रधान शिक्षक
समस्तीपुर जिले अंतर्गत रोसड़ा प्रखंड में एक छोटे से ग्रामीण क्षेत्र में स्थित प्राथमिक विद्यालय राम विलास टोल धर्मपुर रहुआ रोसड़ा समस्तीपुर सरकारी विद्यालय लंबे समय से अनेक समस्याओं से जूझ रहा था। विद्यालय में भवन और कमरे दयनीय स्थिति में थे, साथ ही बच्चों की उपस्थिति संतोषजनक नहीं थी। कक्षाओं में सीखने का वातावरण कमजोर था और अभिभावकों का विद्यालय के प्रति जुड़ाव भी कम था। विद्यालय परिसर में स्वच्छता और हरियाली का भी अभाव था।
इसी विद्यालय में पिछले वर्ष श्री रणजीत कुमार ने प्रधान शिक्षक के रूप में कार्यभार संभाला। उन्होंने विद्यालय की स्थिति को देखकर किसी को दोष देने के बजाय स्वयं से एक प्रश्न किया—
“क्या हमारा विद्यालय ऐसा नहीं बन सकता, जहाँ बच्चे खुशी से आएँ, शिक्षक उत्साह से पढ़ाएँ और अभिभावक गर्व से अपने बच्चों को यहाँ भेजें?”
यहीं से विद्यालय के कायाकल्प की कहानी शुरू हुई।
पहला कदम—समस्या को समझना
प्रधान शिक्षक ने सबसे पहले विद्यालय के सभी शिक्षकों के साथ बैठक की। उन्होंने आदेश देने के बजाय सभी से सुझाव माँगे। बच्चों से बातचीत की गई और अभिभावकों से भी उनकी समस्याएँ जानी गईं।
उन्होंने पाया कि विद्यालय में संसाधनों की कमी से अधिक आवश्यकता बेहतर योजना, टीमवर्क और सकारात्मक वातावरण की थी।
उन्होंने शिक्षकों के साथ मिलकर विद्यालय के लिए एक कार्ययोजना बनाई।
कक्षा को बनाया सीखने का केंद्र
प्रधान शिक्षक ने शिक्षकों को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के बजाय बच्चों की समझ और सीखने पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया।
कक्षा में—
- गतिविधि आधारित शिक्षण,
- समूह कार्य,
- प्रश्नोत्तरी,
- कहानी और चर्चा,
- स्थानीय उदाहरणों तथा शिक्षण सामग्री का प्रयोग बढ़ाया गया।
बच्चों को केवल उत्तर याद कराने के बजाय उनसे पूछा जाने लगा—
“तुम ऐसा क्यों सोचते हो?”
इस छोटे-से बदलाव ने बच्चों में प्रश्न पूछने और तर्क करने की आदत विकसित करनी शुरू कर दी।
विद्यालय परिसर का कायाकल्प
प्रधान शिक्षक ने विद्यालय को केवल पढ़ाई की जगह न मानकर सीखने का जीवंत परिसर बनाने का निर्णय लिया।
विद्यालय परिसर की सफाई कराई गई। दीवारों पर बच्चों द्वारा बनाए गए चित्र, शैक्षिक संदेश और विषय संबंधी सामग्री प्रदर्शित की गई।
एक छोटा-सा ज्ञान एवं पठन कोना बनाया गया, जहाँ बच्चे अपनी रुचि की किताबें पढ़ सकते थे। चेतना सत्र मंच एवं बाल मंच का निर्माण कराया गया।
संगीत कार्नर,खेल कोना,एवं अन्य गतिविधियों के एक विशेष कोना बनाया गया।
कबाड़ से जुगाड गतिविधियां भी कराई गई।
विद्यालय में दो बार तिथि भोज आयोजित की गई
जिसमें अभिभावकों एवं जनप्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया।
अब विद्यालय का वातावरण बच्चों को आकर्षित करने लगा।
नामांकन में दुगुनी वृद्धि तथा बच्चों की उपस्थिति में तिगुनी वृद्धि हुई है।
शिक्षकों को बनाया परिवर्तन का साथी
प्रधान शिक्षक जानते थे कि अकेले प्रधान शिक्षक विद्यालय को नहीं बदल सकता। इसलिए उन्होंने प्रत्येक शिक्षक की क्षमता और रुचि के अनुसार जिम्मेदारियाँ बाँटीं।
किसी शिक्षक ने साधारण गतिविधियों की जिम्मेदारी ली, किसी ने पुस्तकालय की, किसी ने खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों की तथा किसी ने डिजिटल शिक्षण की।
प्रधान शिक्षक का आग्रह पूर्वक संदेश था—
“यह मेरा नहीं, हम सबका विद्यालय है।”
इस भावना ने विद्यालय में टीमवर्क को मजबूत किया।
अभिभावकों और समुदाय को जोड़ा
विद्यालय में नियमित रूप से अभिभावक बैठकें आयोजित की जाने लगीं। अभिभावकों को बच्चों की प्रगति के बारे में बताया गया और उनकी समस्याएँ सुनी गईं।
प्रधान शिक्षक ने समुदाय के लोगों से कहा—
“विद्यालय तभी आगे बढ़ेगा, जब विद्यालय और समाज साथ-साथ चलेंगे।”
धीरे-धीरे अभिभावकों का विद्यालय के प्रति विश्वास बढ़ने लगा। स्थानीय लोगों ने भी विद्यालय की गतिविधियों में सहयोग देना शुरू किया।
तकनीक और नवाचार का प्रयोग
जहाँ संभव हुआ, वहाँ डिजिटल संसाधनों का उपयोग किया गया। कठिन विषयों को चित्र, वीडियो और डिजिटल सामग्री की सहायता से समझाया जाने लगा।
प्रधान शिक्षक ने शिक्षकों को यह भी समझाया कि तकनीक केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की समझ को आसान और प्रभावी बनाने का माध्यम होनी चाहिए।
बच्चों में दिखाई देने लगा बदलाव
अब विद्यालय का वातावरण बदलने लगा है।
बच्चे नियमित रूप से विद्यालय आने लगे। कक्षा में उनकी भागीदारी बढ़ी। वे प्रश्न पूछने लगे, अपने विचार व्यक्त करने लगे और गतिविधियों में उत्साह से भाग लेने लगे।
एक दिन एक बच्ची प्रधान शिक्षक के पास आई और बोली
“सर, अब मुझे विद्यालय आने का इंतजार रहता है।”
प्रधान शिक्षक मुस्कुराए। उनके लिए यही विद्यालय के वास्तविक कायाकल्प का प्रमाण था।
“हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि विद्यालय की सुंदर दीवारें नहीं, बल्कि बच्चों की आँखों में दिखाई देने वाला आत्मविश्वास है।”
एक वर्षों में विद्यालय की पहचान बदल गई। विद्यालय केवल भवन और कक्षाओं का समूह नहीं रहा, बल्कि ज्ञान, जिज्ञासा, रचनात्मकता, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक चेतना का केंद्र बन गया।
इस परिवर्तन के पीछे किसी एक योजना या किसी एक व्यक्ति का योगदान नहीं था। यह प्रधान शिक्षक के नेतृत्व में शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और समुदाय के सामूहिक प्रयास का परिणाम था।
एक प्रधान शिक्षक केवल प्रशासनिक कार्य करने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह विद्यालय का नेता, मार्गदर्शक, प्रेरक और परिवर्तन का वाहक होता है।
जब प्रधान शिक्षक स्पष्ट दृष्टि, सकारात्मक सोच और टीम भावना के साथ कार्य करता है, तो सीमित संसाधनों में भी विद्यालय में महत्वपूर्ण परिवर्तन संभव है।
“विद्यालय का कायाकल्प भवन बदलने से नहीं,
बच्चों के सीखने का वातावरण बदलने से होता है।”
और इस विद्यालय की कहानी यही संदेश देती है
“एक प्रधान शिक्षक का संकल्प-पूरे विद्यालय की दिशा बदल सकता है।
संकलन कर्ता -देवेन्द कुमार
विशिष्ट शिक्षक
प्राथमिक विद्यालय राम टोल धर्मपुर रहुआ रोसड़ा समस्तीपुर