Diksha Singh (दीक्षा सिंह )
ID: dfe7d6e9cbd9अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर आलेख लेखन एवं संस्मरण लेखन प्रतियोगिता
- Gender: 👩 Female
- Class / Role: 🎓 Class 2
- School: 🏫 Swami Dayananda prep school sikandarpur Muzaffarpur (स्वामी दयानंद प्रेप स्कूल सिकंदरपुर मुजफ्फरपुर )
- District & Block: 📍 MUZAFFARPUR, MUSHARI
- Applied Category: 📝 Student
योग का मेरे जीवन में महत्व
बात उन दिनों की है जब मैं 5 साल की छोटी सी बच्ची थी। मेरी मम्मी की नई नई नौकरी लगी थी। वह भी घर से 55 किलोमीटर की दूरी पर। पापा पहले से नौकरी में थे। इसलिए मुझे रोज मम्मी के साथ उनके स्कूल जाना पड़ता था।
स्कूल दूर होने के कारण हमें रोज बस से यात्रा करनी पड़ती थी और मुझे बस मैं बैठने के कारण रोज उल्टियां होती थीं। जिस कारण से मैं और मम्मी रोज परेशान रहते थे। पर न तो मम्मी अपना स्कूल छोड़ सकती थी और ना ही मुझे घर पर अकेले छोड़ सकती थी।
नतीजा यह निकला कि मम्मी रोज सुबह मुझे एक दवा खिलाकर फिर अपने साथ स्कूल ले जाया करती थी। स्कूल में 9:00 से 4:00 तक रहने के बाद फिर से एक दवा खाकर मैं फिर बस की यात्रा कर अपने घर वापस आती थी। धीरे-धीरे मेरी तबीयत खराब होती चली गई।
एक दिन मैं घर के टीवी में पेप्पा पिग कार्टून देख रही थी। यह कार्टून एक छोटे पीगी फैमली पर आधारित है जिसमें पेप्पा पिग, उसका छोटा भाई जार्ज पिग, मम्मी पिग, और डैडी पिग रहते हैं। डैडी पिग बहुत ही मोटे रहते हैं जिसके कारण उनका पेट बहुत बड़ा होता है।
एक दिन जब पेप्पा पिग की पूरी फैमिली एक सर्कस का शो देखने के लिए जाती है और शो में जोकर का बहुत बड़ा पेट देखकर पेप्पा पिग जोर से हंसने लगती है और चलती शो के बीच में ही जोर-जोर से चिल्लाने लगती है -डैडी आपके जैसा पेट, डैडी आपके जैसा पेट। यह सुनकर जोकर के साथ अन्य दर्शक भी डैडी पीग को देखने लगते हैं। जिससे डैडी पिग घबरा जाते हैं।
घर आने के बाद डैडी पीग यह निर्णय लेते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए मैं अपना पेट कम करके ही रहूंगा। यह सोचकर वह प्रतिदिन सुबह शाम योग करते हैं पर कुछ ही दिनों के बाद वह अपना लिया गया निर्णय भूल जाते हैं और उनका पेट पहले की तरह ही बड़ा रह जाता है।
पर इस शो ने मुझे यह सिखा दिया कि अगर हम रोज योगा करें तो हम स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। इसके बाद मैं रोज सुबह और शाम को योगा करने लगी । परिणाम यह हुआ कि जो मुझे बस में आते जाते उल्टियां होती थी वह अब बंद हो गई थी। अब मुझे दवाइयों का सहारा भी नहीं लेना पड़ रहा था और मेरे द्वारा उठाए गए इस छोटे से कदम से मम्मी की समस्या भी हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो गई। अब मम्मी अपने काम पर पहले से ज्यादा ध्यान लगा पा रही थी।
मुझे अपने ऊपर गर्व महसूस हो रहा था कि मैंने एक छोटी सी ही सही पर मम्मी की मदद तो की। "लव यू मम्मा"