Suman Pandey (सुमन पांडेय )
ID: a1a6665abb30अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर आलेख लेखन एवं संस्मरण लेखन प्रतियोगिता
- Gender: 👩 Female
- Class / Role: 🎓 Class 1
- School: 🏫 UMS PAKHNAHA DHAWAHIYA MADHUBANI (उत्क्रमित मध्य विद्यालय पखनाहा धवहिया मधुबनी )
- District & Block: 📍 PASHCHIM CHAMPARAN, MADHUBANI
- Applied Category: 📝 Teacher
Exclusive Teacher 1
विषय: योग: भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर
प्रस्तावनाभारतीय संस्कृति आदिकाल से ही समग्र कल्याण की पक्षधर रही है। इस संस्कृति ने विश्व को जो सबसे अमूल्य और कल्याणकारी उपहार दिए हैं, उनमें 'योग' सर्वोपरि है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा को एक सूत्र में पिरोने का अनुपम विज्ञान है। उपनिषदों से लेकर आधुनिक युग तक, विशेषकर भारतीय नारी की जीवनशैली और गृहस्थी के संतुलन में योग हमेशा से एक मूक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता आया है।
ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक धरोहर'योग' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की 'युज' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है जोड़ना। महर्षि पतंजलि ने 'योगसूत्र' के माध्यम से इसे एक व्यवस्थित जीवन पद्धति का रूप दिया। सदियों से हमारे ऋषियों और विदुषियों ने इस अमूल्य ज्ञान को जीवित रखा। आज भारत की इसी समृद्ध विरासत का लोहा पूरा विश्व मान रहा है, और हर वर्ष २१ जून को 'अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस' मनाकर इस धरोहर को नमन करता है। यह इस बात का प्रतीक है कि भारत का यह प्राचीन आत्म-विज्ञान आज पूरे विश्व के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का आधार बन चुका है।
आधुनिक जीवन और महिला स्वास्थ्य में प्रासंगिकता
आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में महिलाओं पर दोहरी ज़िम्मेदारी होती है—एक तरफ कामकाजी महिला या शिक्षिका के रूप में अपने कर्तव्य, तो दूसरी तरफ परिवार और बच्चों की देखरेख। इस कशमकश में अक्सर महिलाएँ अपने स्वास्थ्य को पीछे छोड़ देती हैं। ऐसे समय में योग एक ढाल की तरह काम करता है। प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से जहाँ मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन मिलता है, वहीं विभिन्न आसनों से कार्यस्थल और घर दोनों जगह सक्रिय रहने की असीमित ऊर्जा प्राप्त होती है।
निष्कर्ष
योग हमारी संस्कृति की वह धरोहर है जो हमें विपरीत परिस्थितियों में भी शांत और सुदृढ़ रहना सिखाती है। एक शिक्षिका होने के नाते, मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि यदि हम अपनी युवा पीढ़ी, विशेषकर छात्राओं को योग के संस्कारों से जोड़ सकें, तो हम एक स्वस्थ और आत्मनिर्भर समाज की नींव रख सकते हैं। जब घर की धुरी यानी नारी और समाज का प्रत्येक नागरिक योग को अपनाएगा, तभी एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होगा।