SHAILENDRA KUMAR (शैलेन्द्र कुमार )
ID: 1918677cab3fअन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर आलेख लेखन एवं संस्मरण लेखन प्रतियोगिता
- Gender: 👨 Male
- Class / Role: 👩🏫 Teacher
- School: 🏫 Govt. P.S. Bodhsar, Bagaha-2 (रा.प्रा.वि. बोदसर, बगहा-2 )
- District & Block: 📍 PASHCHIM CHAMPARAN, BAGAHA-II (SIDHAW)
- Applied Category: 📝 Teacher
संस्मरण - "मृत्यु-मृदंग के बीच जीवन का अनुलोम-विलोम"
"मृत्यु-मृदंग के बीच जीवन का अनुलोम-विलोम"
यह वर्ष 2019-20 का वह भयावह कालखंड था, जब संपूर्ण वसुंधरा एक अदृश्य, सूक्ष्म और क्रूर महामारी 'कोविड-19' के पाश में असहाय सिसक रही थी। वैश्विक फलक पर प्रतिदिन बढ़ते मृत्यु के आँकड़े केवल ठंडे, बेजान अंक नहीं थे; वे इंसानी वजूद के बिखरते हुए शीशमहल थे, किसी हँसते-खेलते परिवार के उजड़ते हुए आशियाने थे। चारों ओर पसरा सन्नाटा ऐसा था मानो नियति स्वयं मानवता की लाचारी पर कोई अट्टहास कर रही हो। हवाओं में घुली बेबसी और श्मशानों से उठता धुआँ धीरे-धीरे हमारे घर-आँगन, हमारे पड़ोस तक आ पहुँचा था। ढलती हुई शामें अब किसी सुनहरे कल की उम्मीद नहीं लाती थीं, बल्कि किसी न किसी आत्मीय, मित्र या पड़ोसी के बिछड़ जाने की ह्रदयविदारक ख़बरें लाती थीं। ऐसा लगता था मानो जीवन ठहर गया है और केवल मृत्यु की पदचाप चारों ओर सुनाई दे रही है। इस दौरान मानो पूरी दुनिया का चक्का रुक गया था और संपूर्ण धरा एक विशाल कैदखाने में बदल गई थी, जहाँ हर इंसान अपनी ही बंद चौखटों के पीछे सांसों की भीख माँग रहा था।
उस महाविनाश के दौर में, मैं शिक्षा विभाग और उससे जुड़े दायित्वों के बीच प्रखंड बगहा-2 में बी.आर.पी. के पद पर कार्यरत था। जब पूरी दुनिया अपने-अपने घरों के कपाट बंद कर इस वैश्विक कारागार में दुबकी हुई थी, तब प्रशासकीय आदेशानुसार मेरी कर्तव्य-वेदी प्रखंड और अंचल बगहा-2 के अग्रिम मोर्चे पर सजी थी। मेरा दायित्व था—देश के सुदूर कोनों और महानगरों से भूखे-प्यासे, पैरों में छाले लिए अपनी माटी की ओर लौट रहे त्रस्त, क्लान्त और भयभीत प्रवासी श्रमिकों को रिसीव करना, उन्हें बसों के माध्यम से प्रखंड के विभिन्न सुदूर विद्यालयों में संचालित क्वॉरेंटाइन सेंटरों तक पहुँचाना और उनकी चौबीसों घंटे मॉनिटरिंग व उनके प्रबंधन को संभालना। यह कार्य साक्षात 'धधकते अंगारों पर चलने' जैसा था। प्रतिदिन सैकड़ों अनजान चेहरों, खांसते हुए लोगों, थकी हुई व्याकुल आँखों और अनिश्चित सांसों के सीधे संपर्क में आना मेरी दिनचर्या बन चुकी थी। संक्रमण का खतरा किसी भूखे सिंह की तरह हर पल सामने खड़ा था, लेकिन कर्तव्य जब पुकारता है, तब भय को नेपथ्य में जाना ही पड़ता है।
परंतु, इस काँटों भरे पथ पर चलते हुए भी मेरे पास एक ऐसा अभेद्य, अलौकिक और जादुई कवच था, जिसने मुझे भीतर से कभी टूटने नहीं दिया—और वह था 'योग'। वर्ष 2007-08 में पतंजलि से विधिवत दीक्षित एक योग शिक्षक होने के नाते, प्राणायाम और योगाभ्यास मेरी जीवन-चर्या के मेरुदंड रहे हैं। महामारी के उस गहन अंधकार में, जब लोग सुबह उठकर टीवी पर मौतों के आँकड़े गिनते थे, हमारा पूरा परिवार भोर की पहली किरण के साथ ही प्राणायाम के अनुष्ठान में लीन हो जाता था। भस्त्रिका, कपालभाति और अनुलोम-विलोम के गहरे रेचक और पूरक हमारी रगों में जीवन का संचार करते थे। इसके ठीक उपरांत घरेलू काढ़ा, हल्दी और कर्पूर मिश्रित उबलते जल की भाप हमारे दैनिक सुरक्षा-चक्र थे।
इस वैश्विक आपदा ने मुझे एकांत में यह गहराई से सोचने पर विवश किया कि वास्तव में योग ने मेरे व्यक्तिगत जीवन में क्या अमूल्य परिवर्तन लाया है। यदि मैं योग की इस सनातन विधा से न जुड़ा होता, तो शायद मैं भी उस दौर में मानसिक अवसाद, भारी घबराहट और भय के असीम समंदर में डूब गया होता। योग ने मेरे जीवन को केवल शारीरिक सुदृढ़ता ही नहीं दी, बल्कि मेरी आत्मिक चेतना, मेरी सोच और मेरी पूरी जीवन-दृष्टि का ही कायाकल्प कर दिया। योग ने मेरे भीतर 'साक्षी भाव' को जगाया, जिससे मैं संकट को एक दृष्टा की तरह देखने लगा। एक फ्रंटलाइन वर्कर होने के नाते, जब मैं रोज तड़पते हुए लोगों को देखता था, तो पारिवारिक चिंता के कारण संक्रमण का डर स्वाभाविक था। एक अनजाना सा साया—यह गहरा डर कि मेरे माध्यम से कहीं यह अदृश्य वायरस मेरे बूढ़े माता-पिता, मेरी जीवनसंगिनी और मेरे मासूम बच्चों तक न पहुँच जाए—भीतर ही भीतर मेरे अंतर्मन को वैसे ही मथता था जैसे भीषण चक्रवाती हवाएँ किसी शांत और निर्मल झील को व्याकुल कर देती हैं। लेकिन प्राणायाम के दीर्घ अभ्यासों ने मेरे उद्विग्न मन को वह अचला स्थिरता और मानसिक गहराई दी, जिसने इस आदिम डर को 'कर्तव्य-बोध' और 'करुणा' में बदल दिया। योग ने मुझे सिखाया कि विपरीत परिस्थितियाँ हमारे सामने दो ही मार्ग छोड़ती हैं—या तो हम डरकर भाग लें, या फिर सजग होकर परिस्थिति में भाग लें।
योग ने मेरी मानसिक तरंगों को अनुशासित कर मेरे भीतर आत्मविश्वास का एक ऐसा अडिग हिमालय खड़ा कर दिया था, जिसे बाहरी दुनिया का कोई भी तूफान डिगा नहीं सकता था। जहाँ लोग केवल नकारात्मक समाचार सुनकर अवसाद से घिर रहे थे, वहीं योग के कारण मेरा चित्त 'सत्व गुण' से सराबोर रहता था। इसने मेरे तंत्रिका तंत्र को इतना सुदृढ़ कर दिया कि जब चारों ओर हाहाकार मचा था, तब भी मैं ठंडे दिमाग से राहत कार्यों की योजना बना सकता था, अधिकारियों से समन्वय कर सकता था और संकट में फँसे लोगों की प्रशासनिक मदद कर सकता था। यदि मैं केवल अपनी सुरक्षा सोचता, तो शायद कोई न कोई बहाना बनाकर ड्यूटी से हट जाता। लेकिन अष्टांग योग के 'यम' और 'नियम' ने मेरे भीतर सर्व-कल्याण की भावना को इतना प्रगाढ़ कर दिया था कि मुझे क्वॉरेंटाइन सेंटर में रह रहे हर श्रमिक में ईश्वर का रूप दिखने लगा। योग ने मेरे स्वार्थ को परमार्थ में बदल दिया।
आखिरकार, नियति की वह कठिन परीक्षा घड़ी भी आ ही गई, जिसका भय था। अत्यधिक जनसंपर्क के कारण एक सुबह मेरी और मेरी पत्नी की रिपोर्ट 'कोविड पॉजिटिव' आ गई। हम दोनों अपने ही घर के एक बंद कक्ष में पूर्णतः क्वॉरेंटाइन हो गए। वह क्षण ऐसा था जहाँ बड़े-बड़े सूरमाओं का धैर्य जवाब दे जाता है। लेकिन हमने घबराने की बजाय योग रूपी सारथी का हाथ और कसकर थाम लिया। स्वाद और सूंघने की शक्ति का पूरी तरह चले जाना, तेज सिरदर्द, हल्का बुखार और जुकाम—यह शारीरिक लक्षण हमारे ऊपर प्रकट हुए। परंतु, योग के कारण हमारे भीतर जो असीम आत्मबल और जीवनी शक्ति निर्मित हो चुकी थी, उसके सम्मुख कोरोना वायरस का वेग सूखी घास के तिनके की तरह बिखर गया। प्राणायाम की बदौलत हमारा ऑक्सीजन स्तर कभी कम नहीं हुआ। सकारात्मक विचारों की ऊर्जा ने फेफड़ों को कमजोर होने ही नहीं दिया। हम दोनों ने बीमारी को उत्सव की तरह लिया—पठन-पाठन किया, ध्यान लगाया, प्राणायाम की अवधि बढ़ा दी और देखते ही देखते हम इस बीमारी को परास्त कर पूर्णतः स्वस्थ हो गए।
शीघ्र स्वस्थ होने के उपरांत मैं पुनः दुगने उत्साह के साथ रणक्षेत्र में अपनी ड्यूटी पर लौट आया। इसी बीच, मेरे कई मित्र, सहकर्मी और संबंधी भी कोविड की चपेट में आने लगे। वे शारीरिक से ज्यादा मानसिक रूप से टूट चुके थे। भय के कारण उनका दम फूल रहा था। ऐसे में, वे मेरे अनुभवों का लाभ लेने और अपने डगमगाते हौसले को थामने के लिए दूरभाष के माध्यम से मेरे संपर्क में आए। मैं उनके लिए केवल एक मित्र नहीं, बल्कि यमराज के द्वार पर खड़े व्यक्ति के लिए एक उम्मीद की किरण बन गया। मैं प्रतिदिन सुबह-शाम नियम से उन्हें फोन करता, उनकी मानसिक काउंसलिंग करता और उनके भीतर सोए हुए साहस को जगाता। मैं अत्यंत दृढ़ता और आत्मीयता से उनसे कहता कि मित्र! सुनो, पैनिक होने की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है। यह वायरस तुम्हारी आत्मिक शक्ति से बड़ा नहीं है। यह एक सामान्य सर्दी-जुकाम से अधिक कुछ नहीं है। मेरा अटूट विश्वास मानो, यदि तुम आज से नियमित प्राणायाम करोगे, सुबह-शाम काढ़ा और भाप लोगे, तो ठीक तीसरे दिन तुम एकदम भले-चंगे हो जाओगे; क्योंकि मैं खुद इसका जीवंत प्रमाण हूँ, मैं इसे हरा चुका हूँ! बिल्कुल मस्त रहो, टीवी पर अपनी पसंदीदा फ़िल्में देखो, संगीत सुनो, खुद को व्यस्त रखो और यदि मन में तनिक भी बेचैनी या उदासी आए, तो बिना झिझक आधी रात को भी मुझे पुकार लेना, मैं खड़ा हूँ।
मेरे इन शब्दों ने उनके लिए 'संजीवनी बूटी' का कार्य किया। भय के कारण जिनका ऑक्सीजन स्तर गिर रहा था, मेरी आवाज़ सुनकर और प्राणायाम की विधि सीखकर उनका मनोबल सातवें आसमान पर पहुँच जाता था। इस प्रकार, मेरे दर्जनों मित्र इस संकट से सकुशल रिकवर हो गए। वे आज भी जब मिलते हैं, तो इस आत्मीय और मानसिक संबल के लिए मुझे सहृदय धन्यवाद देते हैं। परंतु, जीवन के इस कुरुक्षेत्र में हर लड़ाई हमारे मनमुताबिक नहीं जीती जाती। इस महायुद्ध में जहाँ मैंने दर्जनों लोगों को बचाया, वहीं नियति ने मेरी पीठ पर एक ऐसा घाव दिया जो आज भी हरा है। मेरे दो अत्यंत प्रिय, अजीज और आत्मीय मित्र—विवेक सिंह, कमलेन्दु श्रीवास्तव और आनंद कुमार सिंह—इस कोविड से अपनी जंग हार गए और पंचतत्व में विलीन हो गए। वे मुझसे बहुत दूर दूसरे शहरों के अस्पतालों में वेंटिलेटर पर थे, जहाँ मैं चाहकर भी उन तक अपनी योग-ऊर्जा और सीधे संवाद की संजीवनी नहीं पहुँचा सका। उनका असमय चले जाना मेरे जीवन में एक ऐसा सूनापन, एक ऐसा मरुस्थल छोड़ गया, जिसकी भरपाई संसार का कोई भी वैभव नहीं कर सकता। उनकी स्मृतियाँ आज भी जब मानस पटल पर कौंधती हैं, तो आँखों के कोरे भीग जाते हैं और दिल तड़प उठता है।
इस आत्म-मंथन और संस्मरण का निचोड़ यही है कि योग मेरे लिए केवल कुछ शारीरिक आसनों या मुद्राओं का यांत्रिक समुच्चय नहीं रहा है; यह मेरे जीवन का वह पारस पत्थर बन गया है जिसने मेरी साधारण मिट्टी को सोने में बदल दिया। इसने मुझे सिखाया कि विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अंगद की तरह पैर जमाकर कैसे डटे रहना है और संकटों की छाती पर पैर रखकर कैसे बाहर निकलना है। योग जीवन जीने की एक पूर्ण कला है। यह आपदाओं के थपेड़ों के बीच भी आपके भीतर धैर्य का दीया जलाए रखता है, एकाग्रता का संबल देता है, अनुशासन का पाठ पढ़ाता है और आपकी सोच को सकारात्मकता के महासागर में तब्दील कर देता है। जब बाहरी दुनिया में चारों ओर महामारी और मृत्यु का निर्दयी मृदंग बज रहा हो, तब अपने अंतर्मन में डूबकर जीवन का प्राणायाम अबाध गति से चालू रखना, खुद को सुरक्षित रखना और अपनी ऊर्जा से दूसरों के बुझते हुए दीयों को जीवनदान देना ही योग का वास्तविक, व्यावहारिक और सबसे सुंदर स्वरूप है। योग ही जीवन का शाश्वत सत्य है।
- शैलेन्द्र...