Patna, Bihar, India An Education Community Initiative
RAVIKESH KUMAR (रविकेश कुमार )
ID: 6a4f2420f9cb

शिक्षा के गुमनाम नायक

  • Gender: 👨 Male
  • Class / Role: 👩‍🏫 Teacher
  • School: 🏫 P. S. KHAIRAHAWA TOLA , BAGAHA 1 (रा0 प्रा0 विद्यालय खैरहवा टोला बगहा 1 )
  • District & Block: 📍 PASHCHIM CHAMPARAN, BAGAHA-I
  • Applied Category: 📝 स्वयं शिक्षक
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एक शिक्षक की यात्रा - संघर्ष से बदलाव तक

मेरे शिक्षक जीवन की पहली सीढ़ी के साथ वर्तमान


मैं रविकेश कुमार, मेरा पहला विद्यालय रा० प्रा० विद्यालय इमिलिया नरकटियागंज प० चम्पारण, योगदान फरवरी 2022, कुछ जगह केवल एक स्थान नही होता, वह हमारे जिंदगी की दिशा बदल देता है, जब मैने पहली बार एक शिक्षक के रूप मे विद्यालय की दहलीज पर कदम रखा, वह मेरा पहला विद्यालय था, मनमे उत्साह भी था, और थोडी घबराहट भी, मगर इन सब से परे मेरे अन्दर एक उत्साह था, की बच्चो के जीवन को बदलना, क्योंकि बचपन गरीबी मे बितने के कारण मेरी सोच थी की केवल किताब पढाने तक नहीं बल्कि बच्चों के भीतर विश्वास, संस्कार और सपनों को उड़ान दू। यहीं से शुरू हुई वह यात्रा जिसने मुझे एक शिक्षक नहीं बनाया बल्कि हर दिन कुछ नया सीखने वाला एक छात्र भी बना दिया।जब मैं पहली बार विद्यालय गया तो बच्चों की उपस्थिति बहुत कम थी। जब इस बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि यहाँ इस गाँव के लोग बहुत गरीब हैं और पूरे गाँव में शिक्षित लोगों की संख्या कुछ गिने-चुने ही हैं। गाँव में कोई सरकारी नौकरी नहीं है। जब बच्चे दसवीं पास करते हैं तो गाँव में एक अलग ही माहौल बन जाता है, मानिए कोई त्योहार आ गया है।अब मेरे सामने बहुत सारी चुनौतियाँ थीं और मैंने उन सभी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए बच्चों के, गाँव की बेहतरी के लिए प्रयास करना शुरू किया।सर्वप्रथम विद्यालय के अपने प्रधानाध्यापक मो० नाजिर सर जी, जो मेरे अभिभावक के समान थे, एक शांत स्वभाव, आदर्श व्यक्तित्व और प्रचंड विद्वान थे। उनके सानिध्य में विद्यालय निरंतर आगे बढ़ता रहा। साथ-साथ विद्यालय के सभी शिक्षक हमेशा ही मेरा साथ दिए, वे सभी बहुत अच्छे थे।इसी दौरान बच्चों की उपस्थिति सुधारने हेतु अपने प्रधानाध्यापक के साथ गाँव में घर घर घूमे, घूमने पर पता चला कि कोई बकरी चराने, कोई ईंट-भट्ठे में काम करने, कोई लकड़ी हेतु बगीचे में, तो कोई घर पर बच्चा खेलाने के लिए तो कोई ऐसे ही घर की रखवाली हेतु आदि कई अन्य कारणों से घर पर ही रह जाता था।अब मुझे लगा की इन सभी समस्याओं के समाधान हेतु एक-एक अभिभावक से बात करनी चाहिए इसके लिए अपने प्रधानाध्यापक से अभिभावक बैठक बुलाने की बात कही मगर उनके द्वारा कहा गया की सभी अपने अपने कामो में रहते है कोई नहीं आता है। फिर भी हम जिद्द किए की नही सर बैठक रखी जाए तो बैठक का समय और दिन निर्धारित हुआ। उस बैठक के दिन सुबह मेरे अंदर बहुत कौतुहल थी, मेरी अभिभावक के साथ पहली बैठक जो थी। हमारी तैयारी पूरी थी मगर सच में कोई अभिभावक नही आए, अब अपनी बैठक बुलाने की जिद्द के कारण मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई।अब हमने भी ठान लिया की उपस्थिति बढ़ाने हेतु एक-एक अभिभावक से व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित करना होगा। हमने अपने प्रधानाध्यापक को बिना बताए छुट्टी बाद नियमित रूप से गाँव में जाकर शिक्षा और बच्चों के साथ अभिभावक के भविष्य के बारे में बात करता और समझाता। इस दौरान कुछ लोगशराब पीने हेतु, दवाई कराने हेतु मुझसे पैसों की माँग करने लगे। गाँव के ऐसे लोगों का मैं दुश्मन न बन जाऊँ इसके लिए इनके मुराद को पूरी करना मेरी मजबूरी बन गई। मगर नशा मुक्ति को लेकर हमने अपनी योजना बनाई और कक्षा कक्ष में नशा मुक्ति पर जागरूकता के साथ साथ अभिभावक और पूरे गाँव को इसके दुष्प्रभाव पर चर्चाएँ की।बच्चों की उपस्थिति अभी भी ठीक नहीं हुई मगर मेरे हौसले अडिग रहे हमारा विद्यालय भवनहीन था जिस कारण बगल के गाँव के मध्य विद्यालय इमिलिया जमुनिया में चलता था। अब हमने अपने विद्यालय को स्वच्छ एवं सुंदर बनाने की ठानी इसके लिए पैसों की जरूरत महसूस हुई मगर हमारा विद्यालय भवन हीन था जिस कारण पैसे नहीं आए थे शायदl हमेंअब विद्यालय में दो कमरे वाला एक घर था जो परित्यक्त था न प्लास्टर थी न रंग रोधन निचे भी मिट्टी थी बरसात में पानी टपकता नहीं बल्कि झरने की तरह गिरता रहता था l अब पूरे विद्यालय को सुंदर बनाने के लिए परिसर में फूल-पौधे लगाने के लिए दुसरे विद्यालय के प्रधानाध्यापिका चिन्ता कुमारी मैडम जी से अनुमति माँगी चुकि विद्यालय की सभी मिट्टी बंजर थी जिसमें बालू पत्थर थे इसके कारण उन्होंने मना कर दिए की नहीं,नहीं लग पायेगा लगेगा भी तो बच्चे बचने नहीं देंगे तोड देंगे। अब मैं हतोत्साहित हो गया मगर चिन्ता कुमारी ममता की सागर थी उनको किसी तरह मना लिये।अब मेरे घर से विद्यालय 36 किलोमीटर दूर पड़ता था जाने में परेशानी तो थी मगर हमने इसका फायदा उठाया वो ये की घर से विद्यालय तक के रास्ते में जितने भी फूल-पौधे दिखाई देते थे उसको घर मे था तो मांग लेते रास्ते मे मिलता तो उखाड़ कर अपने विद्यालय लेकर आ जाते, बच्चों के साथ मिलकर लगा देते थे मगर अगले दिन वह पेड़ पौधे और फूल सभी गायब हो जाते थे फिर भी हमने हार नहीं मानी, कितनी बार कोई उखाड़ेगा हम रोज-रोज कोई न कोई पौधा लगाने लगे धीरे-धीरे पौधा उखाड़कर ले जाने वाला हार गया और मेरी जीत हुई। मेरा विद्यालय हरा भरा हो गया और एक आश्चर्य की बात ये हुई की हमारे बच्चों की उपस्थिति बढ़ गई हम रोज बच्चों को लेकर फूलों पौधों की निराई,गुड़ाई और सिंचाई प्रारंभ कर दिए अब बच्चे पढ़ने के बहाने नहीं फूल पौधे की देखभाल और पानी पटाने के बहाने आने लगे, हम तो यही चाहते थे इसी पौधों की देखभाल के साथ पढ़ाई भी होती जाती थी। अब मेरा अगला उद्देश्य था बच्चों को खेल खेल मे पढ़ाना, खेल खेल में शिक्षा देना मगर हमारे पास पर्याप्त जगह नहीं था, हमारे विद्यालय के सामने एक बगीचा था वह कूड़ा - करकट एवं गंदगी से भरा पड़ा था हमने बगीचे के मालिक से अनुमति मांगी की बीना आपके बगीचे को नुकसान पहुँचाए हमारे बच्चे इसमें खेलेंगे और पढ़ेंगे हमारे प्रधानाध्यापक एवं सभी शिक्षकों के साथ-साथ हमारे नम्र निवेदन से बगीचा मालिक से कुछ शर्तों के आधार पर अनुमति मिल गई।ऐसा लगा मानिए हमारे पँख उग गए हैं एक नई ताकत आ गई हमने पूरे लगन के साथ बच्चों को पढ़ाने खेलाने, हँसाने और उनके परिवार की बेहतरी के लिए काम करना शुरू कर दिए।बहुत अच्छा लगता हमारा विद्यालय मनमोहक लगने लगा, पहली बार हमने अपने विद्यालय में 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन बच्चों का प्रोग्राम करवाए। गाँव में मेरी कद्र (आदर) बढ़ गई। सभी हमारे बातों को मानने लगे। जब भी कोई कार्य होता था हम और हमारे प्रधानाध्यापक गाँव में घर-घर जाकर के अभिभावक से मिलकर समस्या समाधान करवाते। बच्चों का लगाव विद्यालय से इतना लग गया की बच्चे अब घर पर न रहकर विद्यालय आने लगे।हमारे बच्चों के अन्दर एक चीज की कमी खलती थी वह यह की जिस विद्यालय में हमारा विद्यालय चलता था तो उस विद्यालय के बच्चे बेंच डेस्क पर बैठकर पढ़ते थे मगर हमारा विद्यालय के भवनहीन होने के कारण हमारे पास बेंच डेस्क नहीं थे। जिसके हमारे बच्चे चट्टी, बोरा, दर्री पर बैठते थे। जिससे उस विद्यालय के बच्चे हमारे बच्चों को चिढ़ाते थे। जिस कारण हमारे बच्चे अपने आप को हीन एवं निम्न समझने लगे। मगर हमने इस हीन भावना को विपरीत कर दिया।हम अपने बच्चों को TLM, गतिविधि, गीत, संगीत, नाटक, खेल आदि के माध्यम से पढ़ाना शुरू कर दिए। अब हमारे बच्चे आनंदमयी माहौल में पढ़ने लगे, कभी टूटे फूटे बरामदे में तो कभी गर्मी के कारण बगीचे में।अब हम खुश थे, हमारे बच्चे खुश थे, अभिभावक खुश थे और हमारी सरकार भी हमसे खुश थी। धन्यवाद देना चाहते हैं अपनी सरकार और शिक्षा विभाग के सभी पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों को जिन्होंने विद्यालय में बहुत से TLM का सामान एवं कुछ अन्य संसाधन उपलब्ध करवाए।कक्षा-कक्ष के दौरान अपने अनुभवों को निरंतर बेहतर बनाते गए। इसी दौरान हमें 2023 में माननीय प्रधानमंत्री के द्वारा परीक्षा पे चर्चा हेतु धन्यवाद पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें उनके द्वारा हस्ताक्षरित तीन प्रतियां प्राप्त हुईं, जो हमें और लगन के साथ काम करने की प्रेरणा दी।कुछ समय बाद जनवरी 2025 में शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव डा० एस० सिद्धार्थ सर द्वारा Teacher of The Month का प्रशस्ति पत्र प्राप्त हुआ। पुनः अप्रैल 2025 में Teacher of The month प्रशस्ति पत्र के मिलने से मेरे अन्दर एक नई उर्जा का संचार हुआ।हम अपने बच्चों से बहुत ज्यादा प्यार करते थे मगर मेरे घर से विद्यालय की दूरी 36 किलोमीटर थी, जो दोनों तरफ से आने जाने का मिलकर 72 किलोमीटर होता था। कई बार मेरे साथ यात्रा के दौरान छोटी-मोटी दुर्घटनाएँ हुई और हमेशा से बड़ी दुर्घटना होने का डर लगा रहता था। इसी क्रम में मेरा स्थानांतरण हो गया। अपना बनाया हुआ बच्चों का साम्राज्य बिखर गया l बच्चे भावुक न हो, वे डरे नही, उनका उत्साह कम न हो उनके पढ़ने का रफ़्तार बढ़ता रहे इसी कारण हमने अपने बच्चों से विदाई नहीं करवाई बल्कि अपनी आगे की पढ़ाई का बहाना बनाकर नये विद्यालय राजकीय प्राथमिक विद्यालय खैरहवा टोला, बगहा-1 में योगदान किए। अब नया विद्यालय, नये बच्चे,नया माहौल था मगर मेरे बिछड़े बच्चों की किलकारी, मासूमियत, वह अपनापन, वह लगाव, वह समर्पण याद कर आँखों से आँसू टपक आते थे तो उन बच्चों का क्या होता होगा वे तो सभी मासूम थे।यादों के साये में जब आम पेड़ो मे लग जाते तो बच्चे खुद न खा क़र के सबसे पहले मुझे लाकर देते थे। उनके घर कुछ भी मेरे लायक मिल जाए तो बिना मुझे दिए, चैन से नहीं बैठते थे सच में वे बच्चे मेरे लिए सब कुछ थे।अब नए बच्चों से हिलना मिलना और उन बिछड़े बच्चों के समान इन्हें बनाना वाकई मेरे लिए एक अलग अनुभव था।और संयोग ऐसा हुआ की यह विद्यालय भी भूमिहीन एवं भवन हीन था, मगर मेरे अंदर नई उर्जा व नई ताकत थी। हमने इन बच्चों को बहुत जल्द अपना बना लिया।मुझे इन बच्चों से प्रेम बढ़ता गया वो फटे हुए कपड़े बिना चप्पल एवं बिना जूता के आने वाले बच्चे मुझे बेहद भावुक बना देते थे वही हाल नये विद्यालय में हुआ यहाँ भी हम अभिभूत हो गये मगर मेरा सफर निरंतर जारी रहा।इसी क्रम में मुझे जिला स्तरिय शिक्षक सम्मान के रूप में 5 सितम्बर 2026 को जिला पदाधिकारी और जिला शिक्षा पदाधिकारी के कर कमलों से सम्मानित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।बच्चों की बेहतरी के लिए मेरा प्रयास निरंतर अग्रसर रहेगा। बच्चों के चेहरे की मुस्कान मुझे नई उर्जा देती रहती है। मेरा जीवन इन बच्चों में ही समर्पित है ये बच्चे गुलाब के फूल हैं और हम इनके माली।हम शिक्षक हैं और हमारे आंगन में राष्ट्र का भविष्य खेलता है।जय शिक्षा! जय शिक्षक, जय बिहार, जय हिन्द, जय भारत। 


पहला विद्यालय 

P. S. EMILIYA, NARKATIAGANJ, WEST CHAMPARAN


नया विद्यालय


RAVIKESH KUMAR 

EXCLUSIVE TEACHER 

P S KHAIRAHAWA TOLA BAGAHA 1, PIN 845101, WEST CHAMPARAN 

MO 7250347779